आपके जानिब.....

आपके जानिब...आप सभी को अपनी रचनाओं के माध्यम से जोड़ने का एक सार्थक प्रयास हैं, जहाँ हर एक रचना में आप अपने आपको जुड़ा हुआ पायेंगे.. गीत ,गज़ल, व्यंग, हास्य आदि से जीवन के उन सभी पहलुओं को छुने की एक कोशिश हैं जो हम-आप कहीं पीछे छोड़ आयें हैं और कारण केवल एक हैं ---व्यस्तता

ताजगी, गहराई, विविधता, भावनाओं की इमानदारी और जिंदगी में नए भावों की तलाश हैं आपके जानिब..

Sunday, August 31, 2025

गजल--तेरी राह देखती है

 


मैं भटक सा रहा हूँ बेखबर राहों में,

मिरी मंज़िल तेरे आने की राह देखती है।


चाँदनी से सजी रात यूहीं ख़ामोश सी है,
तेरी यादें मेरी साँसों की पनाह देखती है।

अंधेरे से साये हर कदम साथ चलते हैं,
एक उम्मीद दूर रोशन निगाह देखती है।

दिल के वीराने में तूफ़ानों का है डेरा लगा,
अब मोहब्बत तेरे होने की गवाह देखती है।

तेरे नाम की ये रोशनी जो जलती है दिल में,
ये दीवानगी भी तुझको अब खुदा देखती है।

तेरी खुशबू से महकते हैं सब ख्वाब मेरे,
तेरी धड़कने मेरी रुबाई की सदा देखती है।

तन्हा है तेरे बिना पूरा मेरा ये कारवाँ,
"अंजान" सी कशिश अब तेरी चाह देखती है

गजल- दास्ताने मोहब्बत

 

उनसे क्या मिले कि हम पहचान से गए,

जो भी रुतबा था हम उसकी शान से गए।


इश्क़ का ख़ुमार कुछ इस क़दर चला,

क़िस्तों में कटी ज़िंदगी और हम जान से गए।

ख़्वाबों की रवानी थी कि निगाहों का था नशा,

ज़िक्र आया उनका लब पे, तो हम अरमान से गए।

नादाँ दिल को समझाते रहे दुनिया जहाँ के लिए,

वो जब भी मुस्कुराए तो हम ईमान से गए।

उस सफ़र-ए-इश्क़ में जो रास्ते मिले,

मंज़िल भी मिली न और हम थकान से गए।

‘अंजान’ दास्ताँ है यह मोहब्बत की पुरानी,

जिनसे उम्मीद थी, हम उसी गुमान से गए।

Monday, March 31, 2025

शौर्य की हुँकार

रणभूमि में गूंजे गर्जन,

शेरों सा हुँकार उठे।

वीरों के साहस से देखो,

पर्वत भी थर-थर काँप उठे।।

खड्ग उठा जब हाथों में,

बिजली बन कर चमक उठे।

शत्रु दल के मस्तक पर,

मृत्यु बन कर वो गिर पड़े।।

माँ के लाल लहू से अपने,

माटी को चंदन करते हैं।

सर कट जाए लेकिन फिर भी,

पीछे कदम न धरते हैं।।

धधक उठे जब रण का अंगारा,

आंधी बन कर वो चलते हैं।

वीर शिवा, प्रताप की धरती,

रक्त से जयघोष वो भरते हैं।।

सर कट जाए धड़ चलता है,

जय जय कार सुनाई देती है।

रण में बस विजय लिखी हो,

उन्हे मृत्यु न दिखाई देती है।।

धरती को सींचा लहू से,

फिर तिरंगा लहराया है।

माँ भारती के हर बेटे ने,

बलिदान का दीप जलाया है।।

आएगें सौ संकट घनघोर,

हम नभ में गर्जन कर देंगे।

दुश्मन की काली ताकत को,

हम उसके सीने में भर देंगे।

जय भारत! जय वीरों की!

माँ का हम मान बढ़ाएंगे।

जब तक साँसें हैं इस तन में,

हम हर शत्रु मिटाते जाएंगे।।

हमें मिटा पाओगे कैसे,

हम गर्व की एक मिसाल हैं।

हर युग में हम जन्म लेंगे,

हम भारत भूमि के लाल हैं।।

हम हैं वो सूरज, जो रण में,

लहू की किरणें बरसाएंगे।

अपने शौर्य की हुँकार से

हम धरती सजाते जाएंगे

Saturday, March 22, 2025

हम फिदाए लखनऊ!

 हैं और भी दुनिया में शहर 

पर तेरी अलग बिसात ए! लखनऊ 

दिल दिमाग पर कुछ इस कदर

छा सा गया है शहरे ऐ लखनऊ !


गलियां हो नक्कखास की

या फिर अमीनाबाद की

हर इक तंग गली में जनाब 

दिख जाएगा तुझे ऐ लखनऊ !


बजारों की रौनक हो,

या वीरान पड़ी इमारतें

सूरते हाल कुछ भी हो

मुस्कुराता मिलेगा तुझे ऐ लखनऊ !


टुंडे का हो कबाब या

प्रकाश की हो कुल्फी 

जुबाँ पे चढ़ जाएगा तेरे

हर जायका ऐ लखनऊ !


रेशमी साडी हो या फिर 

चिकनकारी हो कुरतों की

इक बार आजमा ली तो

बस जाएगा तन पे ऐ लखनऊ !


हुसैनाबाद की जुमा मस्जिद हो

या हनुमान सेतु का मन्दिर 

सिर कहीं भी झुकाओ अपना

दिख जाएगा तुझमें खुदा ऐ लखनऊ !


हिन्दु भी हैं मुस्लिम भी हैं

धर्म और भी हैं बसते

गंगा-जमुनी तहज़ीब है यहाँ

कौमी एकां की मिसाल ऐ लखनऊ !


मीर का शहर कहो इसे

या बिस्मिल का कहो नगर 

कूचे कूचे मे बसा था हुनर

बदस्तूर आज भी छिपा ऐ लखनऊ! 


अब क्या जवाब दूँ मैं,

तेरे इस सवाल का

है कौन सा शहर लाजवाब 

जुबाँ पर एक ही नाम ऐ लखनऊ!


इस शहर की आबो-हवा के, 

हम पर इतने सायें हैं, 

मुफ़लिसी में भी यहाँ हमने

खूब जश्न मनाये हैं, 

अदब व तहजीब के संग, 

दौड़ेगा जब तलक रगो में खूँ 

कोई भी तेरी हस्ती मिटा, सकता नहीं ए! लखनऊ








गज़ल

वो अंदर से टूटा है, पर हारा नहीं है,

टीस है अपनों की, वक़्त का मारा नहीं है।

सह चुका है हर दर्द, पर ज़ख़्म अब भी हरा है,

मगर ज़िन्दगी से उसने किया किनारा नहीं है।

छोड गए सब अपने, हर इक राह में मुझको

दिल ने किसी से शिकवा किया दोबारा नहीं है।

आँधियों ने चाहा था हर दीप बुझाने को,

पर हौसले को जलना अभी गंवारा नहीं है।

गिरा, सम्भला, चला, फिर से अपनी डगर,

वो टूटा ज़रूर है, पर बेसहारा नहीं है।

ज़ख़्म दिल के सी लिए, अश्को को पी गया,

लिखता रहा दर्द, मगर वो बेचारा नहीं है।

जो छले गए वक़्त की साज़िशों से दोस्तों

वो भी कहते हैं देखा "ऐसा सितारा नहीं है।"


Tuesday, March 18, 2025

नारी

नारी अपने आप में, एक अभिव्यक्ति है,

जैसी भी है तू ,अपने आप में एक शक्ति है।


तेरी ममता में बहारों की दिखती है कोमल छाया,

तेरी दृढ़ता ने हर युग में, एक नया पथ दिखाया।


संघर्षों में भी तूने खुद को, क्या खूब तराशा है,

अश्रुओं से झरते मोती, हर दुख में इक आशा है।


तेरी गोद में ही सजता है , सृष्टि का हर इक रंग,

तू न हो तो ये जगत भी, हो जाता है बेढंग।


तू कभी है दुर्गा तो, कभी मीरा की है मूरत,

तू कभी करुणा तो, कभी क्रांति की है सूरत।


तेरे विचारों में छिपी है ,सृजन की अग्नि भी,

तेरे सपनों में है दिखती,जिद्द की इक उमंग भी।


तू चाहे तो पर्वत भी, तेरे आगे झुक जाए,

राहों में तेरी दुनिया का, हर इक पल रुक जाए।


तू है सरस्वती तू ही है, विद्या का अथाह सागर,

तेरी बुद्धि से ही बने, देखो रिश्तों मे एक आदर


तू लक्ष्मी है तुझसे ही है, समृद्धि की पहचान,

तेरी कृपा से महके आंगन, तू है कृपानिधान


तू प्रेम की है मूरत, तुझ में है शक्ति अपार,

तेरे बिना अधूरा है, जग का हर एक घर-परिवार।


नमन तुझे है मेरा हर क्षण, तू हर रूप में है सुंदर,

तू न हो तो वीरान हो जाए,ये धरती और समंदर।


तू केवल देह नहीं, तू आत्मा की है अल्पना,

तेरे बिना अधूरी है, इस सृष्टि की कल्पना।


गजल

वो खुद ही अपने सवालों में उलझने लगे,

बातों-बातों में देखिये कैसे वो मुकरने लगे।


मांग रहा था भूखा कोई दो जो रोटियाँ,

उससे यारो आप चाँद की बात करने लगे।


जल रही थी झोपड़ी, जब किसी की शाम से,

आप उससे महफ़िलो में जाम की बात करने लगे।


हाथो में हैं छाले उसके,और पैरों में हैं पत्थर पडे

उससे यारो कैसे आप आराम की बात करने लगे।


सांस उखड़ी हुई है उसकी, महँगाई की मार से,

न जाने क्यों उससे आप जश्न की बात करने लगे।


जो गिरा था राह में देखो, हो के बेबस लहू-लुहान,

उसे छोड़ आप मस्जिद-मन्दिर की बात करने लगे।


जिसके घर उजड़े हुए है, उसी से सबक न लिया,

सिर पर रख आप फिर इल्ज़ाम की बात करने लगे।


पैरों तले ज़मीन तक, नहीं बची हुई है जिसके,

उससे आप ऊँचाइयों के मक़ाम की बात करने लगे।


जिसके हिस्से की रौशनी, छीन ली गई हो दोस्तो,

उसे पास बैठा कर आफ़ताब की बात करने लगे।


बच्चे किताबों को तरसते, रहते हैं अब दिन-रात,

आप उनसे तालीम-ए-ख़्वाब की बात करने लगे।


सड़कों पे सो गए हैं , थक हार कर कई बेघर लोग,

उनसे आप यारों ऐशो-आराम की बात करने लगे।


आँखों में आँसू थे उनके, और लब थे मगर ख़ामोश,

आप उनसे फिर भी इन्क़लाब की बात करने लगे।


गजल

मेरे साहिब मुझे ज़ोरदार नज़र आते हैं

जिधर देखूँ उन्हें, वो लगातार नज़र आते हैं


कभी ख़्वाबों, कभी दिल की हरारत में मिले,

हर जगह मेरे वही, राज़दार नज़र आते हैं।


बात कहनी हो अगर, पर होंठ हिलते भी नहीं,

फिर भी आँखों से बड़े, आशकार नज़र आते हैं।


उनकी यादों का है असर, इक उजाले की तरह,

पर मेरी तरह वो भी, बेकरार नज़र आते हैं।


मैंने चाहा था कभी, ख़ुद से जुदा हो जाऊँ,

पर मिरी राहों में वो, हर बार नज़र आते हैं


दिल की वीरान गली में, जो उजाला कर दें,

मिरी उम्मीदो के चराग़ों के, हकदार नजर आते हैं।


हर तसव्वुर में मेरे, हर अहसास की गहराई में,

हर इक अशआर में,वो दिलदार नजर आते हैं।


सोचा कि भुला दूँ उन्हें, अपने दिल से लेकिन,

आईना देखता हूँ तो, वो ही बार बार नजर आते हैं।


Sunday, March 2, 2025

गजल

 वो और होंगे जो, अपनी मुश्किलों से भागे,

अपने हौसले हैं बुलंद, उड़ान आसमाँ से आगे।

राहो में कितने ही काँटे हो, या फिर हो धूप की तपिश,

सीखा है हमने जलना, अपनी परछाँईयो से आगे।

लड़कर बनाए हैं हमने, तुफानों में अपने रास्ते ,

खड़े रहे हैं डटकर, अपने हालातो से आगे।

गर उनकी फ़ितरत है, हमें नीचा दिखाने की,

तो जिद अपनी भी हैं, बढ़ जाएगें उनसे कहीं आगे।

जलाएंगें हिम्मत के दीप, कि डर जाएगा अंधेरा,

सपनों की रोशनी होगी, हर जहाँ से आगे।

जो गिरके संभल जाए, वही है असली लशकरी,

युद्ध चाहे जैसा भी हो, रहेंगा हौसला सबसे आगे।

हर हार के आगे, इक जीत होती है खड़ी 

बस इतना यक़ीं चाहिए, अरमानों से आगे।

Saturday, July 6, 2024

पुराने दोस्त

जेब से तो हम गरीब थे, पर ख्वाब बड़े अमीर थे।

दूरियां चाहे जितनी भी थीं, हम दिल के बेहद करीब थे।

जी लेते थे ज़िंदगी हर पल, वो पल कितने खुशनसीब थे।

बाॅट लेते थे सुख दुख अपने, सडक पर बैठ इक कोने में।
और पी जाते थे सारे गम, भर कर एक चाय के दोने में।
मतलबी लोगो में फसे, हम अपने ही हबीब थे।
जी लेते थे ज़िंदगी हर पल, वो पल कितने खुशनसीब थे।

एक दूसरे के पूरक थे हम, इक दूजे की जरूरत थे।
छोटी छोटी जीत के महलो पर, अपनी ही एक हुकूमत थे।
धूर्तों की नगरी में देखो, हम अपने ही नजीब थे।
जी लेते थे ज़िंदगी हर पल,वो पल कितने खुशनसीब थे।

उनको कुछ मालूम नहीं था, हम पर जो भी हँसते थे।
पीठ पीछे कुछ भी कहते हो, पर सामने कहने से डरते थे।
एसे कायरों के बीच मे रह, हम अपने ही मुजीब थे।
जी लेते थे ज़िंदगी हर पल, वो पल कितने खुशनसीब थे।

हमे आज भी नहीं किसी से, न शिकवा न कोई गिला।
जीवन से जो चाहा हमने, उससे ज्यादा ही हमे मिला।
जी लेते हैं आज भी हर पल, उतनी ही खुशनसीबी से।
दूर भले हो आज मगर , पर दिल रखते है करीबी से।
बातें हो न हो दिनो तक, पर यादों का जाल बिछाते हैं।
ये वही पुराने दोस्त हैं जो, जो ता उम्र साथ निभाते हैं।

Tuesday, June 4, 2024

गज़ल

जिंदगी को कुछ इस तरह बेहतर बनाया मैंने

सभी को दिया पर किसी से न कुछ पाया मैंने


कोशिशें बदस्तूर जारी रक्खी ता उम्र अपनी
हर उलझनों को धीरे धीरे से सुलझाया मैंने

तुम कहते हो की सब कुछ हमें यूहीं मिल गया
हर मशक्कत के छिपे छालों को छुपाया मैंने

मंजिलो पर होती है हमेशा से मेरी नजर
मील के उन पत्थरों को न कभी अपनाया मैंने

जलते बुझते रहते हैं जो ये मुहब्बत के चराग
ये आफ़त हम पे न गिरे इसलिए दिल न लगाया मैंने

रिश्तों में आई कड़वाहट से मन भर गया अब
ये बात परे रख हर रिश्तों को दिल से निभाया मैंने

वो टूट के जब बिखरे तो मौत के आगोश में थे
मैं भी कई बार टूटा पर जिंदगी को गले लगाया मैंने

कितनी बेमुरव्वत बेरहम है दुनिया की हकीक़त दोस्तों
इसलिए पहले से ही हर जख्म पर मरहम लगाया मैंने

Sunday, June 2, 2024

चाँद और विज्ञान

 


अब आज समय वो आ ही गया,
जब चाँद पे रखा हमने कदम
दुनिया स्तब्ध है हैरत में, 
कि कैसै पहुँचे चाँद पे हम
जब चाँद के दक्किन ध्रुव को,
सब एक पहेली समझे थे
कैसे पहुँचेगे उस सतह पर, 
सब अपनी कोशिश में लगे थे
हमारी विफलता पे हसँने वालो, 
देखो ये भी कर दिखलाया
जो न पहुँचा कोई वहाँ, 
उस जहां पे तिरंगा फहराया
आध्यात्म मे हम हैं विश्व गुरू, 
अब विज्ञान की बातें करते हैं
चाँद को तो बस छुआ है, 
अब सूरज की तरफ रूख करते हैं
जो देश हमे नीचा देखें, 
उनको मेरा है बस ये कहना
ना कोई ऊँचा है ना कोई नीचा,
है साथ में लेके सबको बढ़ना

Saturday, May 11, 2024

गज़ल

 कुछ इस तरह नजदीकियाँ बढाई हमने

गम जमा किया और खुशियाँ लुटाई हमने

कमबख्त दिल हमसे कुछ यूँ खेल गया
उनकी सुनते रहे अपनी न सुनाई हमने

इश्क परवान चढ़े मेरा यही ख्वाहिश थी
बस वो रहे जवाॅ इसलिए उम्र घटाई हमने

अब तो मिलना भी उनसे ख्वाबों तक रहा
इसी बाबत जवानी मे नींद बिताई हमने

मरता जा रहा था इश्क मेरा कहीं धीरे धीरे
वो रहे आबाद इसलिए बरबादी कराई हमने

बिकता रहा बाजारों में इक शय की तरह
मोल उनका रहे इसलिए कीमत गिराई हमने

इश्क सबका मुकम्मल हो जाए जरूरी तो नहीं
उनका हो जाए यही सोच बदनामी कराई हमने

Friday, March 22, 2024

दोहे दर्शन - होली विशेष

होलिका देखो जल मरी, हुई हिरण्यकशयप की हार

ऐसा हर इक साल हो, जब नरसिंह ले अवतार


है बासंती मौसम, दिलो में न रखो आग
सापँ नेवले देखिये, मिलकर गावे फाग

मन बसंती तन बसंती, बसंत चारो ओर
रंग उडे गुलाल उडे, फगवा का है शोर

फाल्गुन का महीना, रंगो का है जाल
सजनी साजन के मले, रंग अबीर गुलाल

आस्था और विश्वास पे, लगी समय की घात
पहले जैसी न रही अब, होली की वो बात

फागुन की बयार में, सब कुछ भया अंतरंगी
मृंदंग बन गया है मन, और तन हुआ सारंगी

श्याम वर्ण पर हे! सखी, चढ़ो न दूजो रंग
गोपियों में घिरे श्याम, मुसकाए मंद मंद

देख गोपियो की दशा, उद्धव युक्ति बताए
पहले प्रेम रंग डार दे, फिर हर रंग चढि जाए

धरती पर रंग पसरे सब, हुआ बावरा मन
इक दूजे को जाने बिन, गले लग रहे तन

तेरी मीठी बातों से, तन मन भया गुलाल
बासंती हो जाए धरा, जब तू खोले बाल

उनकी होली कैसे मने, जो सरहद के लाल
दोनो हाथों रख अबीर, नभ में दो उछाल

ये कैसा संयोग है, इस होली के नाम
अवध खेले श्याम संग, द्वारका में श्री राम

राँझां बन के घूम रहे, मिली न उनको हीर
देखे इस होली में इनकी, पलट जाए तकदीर

अब की होली हे! ईश्वर, भर दो इनके थाल
पकवान के ले मजे, हर भूखा इस साल

वो किनारे बैठ कर, करती रही मलाल
बिन साजन होली नहीं, सूखा रह गया गाल

कान्हा बन सब घूम रहे, मुहँ पे रंग लगाए
असमंजस में गोपियाँ, कान्हा उन्हे न बुझाए

हुरियारे नाचत फिरत, पी के ठंडई भंग
जैसे शिव बारात हो, हर कोई मस्त मलंग

प्रकृति हमसे कह रही, खूब खेलो फाग
फागुन मौसम बीतते ही, बरसाऊगीं आग

देश का पैसा खा गए, कर गए बंटाधार 
काश! जेल में बीते इनका, होली का त्यौहार

उनको रंग लगाइऐ,जो टूटे हर बार
हौंसलों के दम पे जो, कर ले मुश्किल पार

फैला दो रंग गगन में, पर मत जाना भूल
पिसना होगा जग में वैसे, जैसे टेसू के फूल

बौराय सब नारी नर, फगुनाय सब संत
भंग घुली हवाओं में,आया ऋतुराज बसंत

अब की होली अवध की, अयोध्या के धाम
सिय के संग रंग खेलत है, वैदेही के राम

धू-धू कर के जल रही,भभक भभक कर आग
वो समझते रहे होलिका,पर बेटी जली थी आज

मूल मंत्र

 

धूप में या चाँदनी में, लाभ में या हानि में

कर्मठी रहो सदा, मधुर अपनी वाणी में


पाप पुण्य के फेर में, सत्य असत्य के ढेर में

निर्जीव तुम न हो कभी, देर या सवेर में


प्रात में या रात में, संग में न साथ में

निडर बन डटे रहो, घात या प्रतिघात में


आस में या निराश में, जीवन के हर इक श्वास मे

सिह सा दहाड दो, धरा से आकाश में


जीत में या हार में, जन्म मरन के सार मे

विचलित होना है नहीं, किसी भी मझधार में


जो हुआ अच्छा हुआ, ये ना कोई मात है

दिन निखर आएंगे, कट जाएगी जब रात है


जिस कर्मक्षेत्र में है तू खड़ा, अवसर ही अवसर है बड़ा 

बस मार्ग में अडे रहो, संकटो से लड़ते रहो

जीवन का यही मूल मंत्र है, 

ये तो बस आदि है, इसका न कोई अंत है


Saturday, February 24, 2024

'चाय' एक एहसास

जब साथ बैठ कोई चाय पीता है,

अपने साथ वो पूरी उम्र जीता है,

कुछ किस्से, कुछ कहानियाँ,

कुछ आप बीती, कुछ पहेलियाँ,

बस इक प्याली चाय में वो

हर रंग बुनता है,

जब साथ बैठ कोई चाय पीता है।


पूछता है कोई जब चाय पियोगे,

जिंदगी के कुछ पल साथ जियोगे,

हम बाटँ लेंगे अपनी चीनी सी मीठी बातें,

कुछ चायपत्ती सी कडवी भरी यादें,

जो बच गया इस पल वो अगली,

प्याली के लिए छोड देता है,

जब साथ बैठ कोई चाय पीता है।

कोई तो बस केवल इसलिए साथ है,

कि बाटँना चाहता है वो पल 

जो अनकहे से हैं अब तक, 

वो दास्तां 

जो अनसुनी सी है अब तलक,

बस इक छोटी सी प्याली में वो

दिल के सब राज खोल बैठता है,

जब साथ बैठ कोई चाय पीता है।


एक प्याली चाय में वो डूबो देना

चाहता है अपने गम को ,

उन किस्सों को जो वो कह न

पाया अपनो से कभी,

सभी फिक्र को इक चाय के

कप के धुयें में उड़ा देना चाहता है,

जब साथ बैठ कोई चाय पीता है।


दोस्तों !! चाय सिर्फ चाय नहीं होती

यह एक कडवा-मीठा सा

एहसास है,

यही वो इक चीज है जो

हर आमो-खास के पास है।


Sunday, February 17, 2019

गज़ल


एक सहारा ही तो चाहा है, किसी का घर नहीं
परिदों से हौसले ही तो मागें हैं, कोई उनके पर नहीं
अब बढ़ा तो पीछे मुड़ के न देखू़ँगा
मैने बस मजिंल चाही हैं, मील के पत्थर नहीं,
आँधियों अब ना आना कभी तुम मेरे आगे
तेरे कहर का मुझ पर, कोई असर नहीं
तू खुदा तो नहीं हैं जो मुझे झुका सके
और जो झुक जाऊं यारो, ऐसा वो मैं सर नहीं
मिटाना चाहे भी तो तू मुझे मिटा नहीं सकता
मैं इक चटान हूँ, कोई रेत का बवडंर नहीं
मेरी खामोशियों को मेरी खामियाँ ना समझ लेना
मैं इक तुफान हूँ, कोई शांत समंदर नहीं
सामने से करो वार गर जो हिम्मत हैं,
मैं इक दिलेर लशकरी हूँ, कोई कायर नहीं
वो मुस़लसल दबाता सा रहा है मुझको
कह दो जाके उसे कोई, मुझे अब किसी के बाप का डर नहीं

Monday, June 23, 2014

परिवार

चार दीवारों से नहीं कोई, परिवार बनता हैं
जब रिश्ते इसमें बसते हैं, तब परिवार बनता हैं
हम भूल जातें हैं और, यह अंतर नहीं दिखता हैं
भाई बहन लड़ते हैं, फिर भी उनमें प्यार दिखता हैं
जब सारा दिन थक कर, माँ चूर हो जाती हैं
परिवार की खुशी के लिए, अपनी खुशी से दूर हो जाती हैं
त्याग करुणा स्नेह का जब, ममत्व बरसता हैं
तब रिश्ते अपने लगते हैं, और परिवार बनता हैं
उर्जा का स्रोत पिता, सबका पालन पोषण करता हैं
परिवार की एकता के लिए, कड़ा अनुशासन रखता हैं
कठोर दिल का हैं, पर बच्चों की तरह हँसता हैं

भाई बहन माँ बाप जहाँ हो, वहीँ परिवार बसता हैं 

Saturday, August 10, 2013

नन्ही कली अश्विका के लिए

दिल में जैसे कोई उतर सा आया हैं
आज मेरे घर इक नया मेहमा आया हैं
कब से था इंतेज़ार इस पल का मुझे
वो हसीं इक नई बहार लाया हैं
उसके रोने में भी उसकी छिपी हैं हँसी
उसकी किलकारियों का इक खुमार आया हैं
खुशियाँ अटखेलियाँ करतीं आगंन में अब
वो “नेह्लोक” में इक नई झंकार लाया हैं
दिल में जैसे कोई उतर सा आया हैं
आज मेरे घर इक नया मेहमा आया हैं
दर्द जितना भी था अब भूल गए हम
साथ अपने वो प्यार बेशुमार लाया हैं
बस उस ईश्वर से अब कोई चाह ना रही
“अश्विका” के रूप में नया संसार पाया हैं
दिल में जैसे कोई उतर सा आया हैं
आज मेरे घर इक नया मेहमा आया हैं

Tuesday, April 17, 2012

दोहे-दर्शन (भाग-२)

इस साल की यह पहली प्रस्तुति “दोहे-दर्शन” (भाग-२) खास आपके जानिब..........

किया जतन से बाप ने, थोड़ा सामान सहेज,

फिर भी बलि चढ़ गयी, जब मिला न उन्हें दहेज,

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जिसने जब ये जान लिया, अपने अंदर का भेद,

कि पार नहीं हो सकता कोई, जब हो नाव में छेद,

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दोनों दीन के दुःख हरे हैं, दोनों की शान अज़ीम,

मस्जिद में रहें राम, या फिर मंदिर में रहें रहीम,

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दुःख पड़े तो सब जपे, सुख में करें ना याद,

इसी बात को सोचकर, है अन्दर मूरत उदास,

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मैंने कह दी सब बातें, अपनी तरफ से साफ़

तुम समझो या ना समझो, अल्लाह करे माफ,

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सहती रहती जुल्म अपने पर, उसमे भी तो है जाँ,

है वो भी किसी की बेटी- बहन, या फिर किसी की माँ,

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पाँव नहीं पसारेगा, कैसा भी हो भ्रष्टाचार,

त्याग दे जब लालच को, और रखें शुद्ध विचार,

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जब मेंढक टर्राने लगे, और कौवे करें कांव कांव,

तब बगुले के भेष में, नेता घुसते देखो गाँव गाँव,

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वो बैठा परदेश में, सब कुछ भूले-भाल,

बूढी अंखियाँ तक रही, कब आओगे लाल,

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पाप पुण्य के फेर में, फसें रहें जीवन भर,

छोटी छोटी खुशियों को, कर गए इधर-उधर,

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सूखी धरती-प्यासी आँखें, भूखे पेट-कई सवाल,

दिल्ली तो बहरी भई, अब किससे कहैं वो हाल,

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लड़ने से कुछ हासिल नहीं, क्या तेरा क्या मेरा,

जिस दिन खुले आँख जब, तब समझो भया सवेरा,

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