आपके जानिब.....

आपके जानिब...आप सभी को अपनी रचनाओं के माध्यम से जोड़ने का एक सार्थक प्रयास हैं, जहाँ हर एक रचना में आप अपने आपको जुड़ा हुआ पायेंगे.. गीत ,गज़ल, व्यंग, हास्य आदि से जीवन के उन सभी पहलुओं को छुने की एक कोशिश हैं जो हम-आप कहीं पीछे छोड़ आयें हैं और कारण केवल एक हैं ---व्यस्तता

ताजगी, गहराई, विविधता, भावनाओं की इमानदारी और जिंदगी में नए भावों की तलाश हैं आपके जानिब..

Tuesday, March 18, 2025

गजल

मेरे साहिब मुझे ज़ोरदार नज़र आते हैं

जिधर देखूँ उन्हें, वो लगातार नज़र आते हैं


कभी ख़्वाबों, कभी दिल की हरारत में मिले,

हर जगह मेरे वही, राज़दार नज़र आते हैं।


बात कहनी हो अगर, पर होंठ हिलते भी नहीं,

फिर भी आँखों से बड़े, आशकार नज़र आते हैं।


उनकी यादों का है असर, इक उजाले की तरह,

पर मेरी तरह वो भी, बेकरार नज़र आते हैं।


मैंने चाहा था कभी, ख़ुद से जुदा हो जाऊँ,

पर मिरी राहों में वो, हर बार नज़र आते हैं


दिल की वीरान गली में, जो उजाला कर दें,

मिरी उम्मीदो के चराग़ों के, हकदार नजर आते हैं।


हर तसव्वुर में मेरे, हर अहसास की गहराई में,

हर इक अशआर में,वो दिलदार नजर आते हैं।


सोचा कि भुला दूँ उन्हें, अपने दिल से लेकिन,

आईना देखता हूँ तो, वो ही बार बार नजर आते हैं।


Sunday, March 2, 2025

गजल

 वो और होंगे जो, अपनी मुश्किलों से भागे,

अपने हौसले हैं बुलंद, उड़ान आसमाँ से आगे।

राहो में कितने ही काँटे हो, या फिर हो धूप की तपिश,

सीखा है हमने जलना, अपनी परछाँईयो से आगे।

लड़कर बनाए हैं हमने, तुफानों में अपने रास्ते ,

खड़े रहे हैं डटकर, अपने हालातो से आगे।

गर उनकी फ़ितरत है, हमें नीचा दिखाने की,

तो जिद अपनी भी हैं, बढ़ जाएगें उनसे कहीं आगे।

जलाएंगें हिम्मत के दीप, कि डर जाएगा अंधेरा,

सपनों की रोशनी होगी, हर जहाँ से आगे।

जो गिरके संभल जाए, वही है असली लशकरी,

युद्ध चाहे जैसा भी हो, रहेंगा हौसला सबसे आगे।

हर हार के आगे, इक जीत होती है खड़ी 

बस इतना यक़ीं चाहिए, अरमानों से आगे।

Saturday, July 6, 2024

पुराने दोस्त

जेब से तो हम गरीब थे, पर ख्वाब बड़े अमीर थे।

दूरियां चाहे जितनी भी थीं, हम दिल के बेहद करीब थे।

जी लेते थे ज़िंदगी हर पल, वो पल कितने खुशनसीब थे।

बाॅट लेते थे सुख दुख अपने, सडक पर बैठ इक कोने में।
और पी जाते थे सारे गम, भर कर एक चाय के दोने में।
मतलबी लोगो में फसे, हम अपने ही हबीब थे।
जी लेते थे ज़िंदगी हर पल, वो पल कितने खुशनसीब थे।

एक दूसरे के पूरक थे हम, इक दूजे की जरूरत थे।
छोटी छोटी जीत के महलो पर, अपनी ही एक हुकूमत थे।
धूर्तों की नगरी में देखो, हम अपने ही नजीब थे।
जी लेते थे ज़िंदगी हर पल,वो पल कितने खुशनसीब थे।

उनको कुछ मालूम नहीं था, हम पर जो भी हँसते थे।
पीठ पीछे कुछ भी कहते हो, पर सामने कहने से डरते थे।
एसे कायरों के बीच मे रह, हम अपने ही मुजीब थे।
जी लेते थे ज़िंदगी हर पल, वो पल कितने खुशनसीब थे।

हमे आज भी नहीं किसी से, न शिकवा न कोई गिला।
जीवन से जो चाहा हमने, उससे ज्यादा ही हमे मिला।
जी लेते हैं आज भी हर पल, उतनी ही खुशनसीबी से।
दूर भले हो आज मगर , पर दिल रखते है करीबी से।
बातें हो न हो दिनो तक, पर यादों का जाल बिछाते हैं।
ये वही पुराने दोस्त हैं जो, जो ता उम्र साथ निभाते हैं।

Tuesday, June 4, 2024

गज़ल

जिंदगी को कुछ इस तरह बेहतर बनाया मैंने

सभी को दिया पर किसी से न कुछ पाया मैंने


कोशिशें बदस्तूर जारी रक्खी ता उम्र अपनी
हर उलझनों को धीरे धीरे से सुलझाया मैंने

तुम कहते हो की सब कुछ हमें यूहीं मिल गया
हर मशक्कत के छिपे छालों को छुपाया मैंने

मंजिलो पर होती है हमेशा से मेरी नजर
मील के उन पत्थरों को न कभी अपनाया मैंने

जलते बुझते रहते हैं जो ये मुहब्बत के चराग
ये आफ़त हम पे न गिरे इसलिए दिल न लगाया मैंने

रिश्तों में आई कड़वाहट से मन भर गया अब
ये बात परे रख हर रिश्तों को दिल से निभाया मैंने

वो टूट के जब बिखरे तो मौत के आगोश में थे
मैं भी कई बार टूटा पर जिंदगी को गले लगाया मैंने

कितनी बेमुरव्वत बेरहम है दुनिया की हकीक़त दोस्तों
इसलिए पहले से ही हर जख्म पर मरहम लगाया मैंने

Sunday, June 2, 2024

चाँद और विज्ञान

 


अब आज समय वो आ ही गया,
जब चाँद पे रखा हमने कदम
दुनिया स्तब्ध है हैरत में, 
कि कैसै पहुँचे चाँद पे हम
जब चाँद के दक्किन ध्रुव को,
सब एक पहेली समझे थे
कैसे पहुँचेगे उस सतह पर, 
सब अपनी कोशिश में लगे थे
हमारी विफलता पे हसँने वालो, 
देखो ये भी कर दिखलाया
जो न पहुँचा कोई वहाँ, 
उस जहां पे तिरंगा फहराया
आध्यात्म मे हम हैं विश्व गुरू, 
अब विज्ञान की बातें करते हैं
चाँद को तो बस छुआ है, 
अब सूरज की तरफ रूख करते हैं
जो देश हमे नीचा देखें, 
उनको मेरा है बस ये कहना
ना कोई ऊँचा है ना कोई नीचा,
है साथ में लेके सबको बढ़ना

Saturday, May 11, 2024

गज़ल

 कुछ इस तरह नजदीकियाँ बढाई हमने

गम जमा किया और खुशियाँ लुटाई हमने

कमबख्त दिल हमसे कुछ यूँ खेल गया
उनकी सुनते रहे अपनी न सुनाई हमने

इश्क परवान चढ़े मेरा यही ख्वाहिश थी
बस वो रहे जवाॅ इसलिए उम्र घटाई हमने

अब तो मिलना भी उनसे ख्वाबों तक रहा
इसी बाबत जवानी मे नींद बिताई हमने

मरता जा रहा था इश्क मेरा कहीं धीरे धीरे
वो रहे आबाद इसलिए बरबादी कराई हमने

बिकता रहा बाजारों में इक शय की तरह
मोल उनका रहे इसलिए कीमत गिराई हमने

इश्क सबका मुकम्मल हो जाए जरूरी तो नहीं
उनका हो जाए यही सोच बदनामी कराई हमने

Friday, March 22, 2024

दोहे दर्शन - होली विशेष

होलिका देखो जल मरी, हुई हिरण्यकशयप की हार

ऐसा हर इक साल हो, जब नरसिंह ले अवतार


है बासंती मौसम, दिलो में न रखो आग
सापँ नेवले देखिये, मिलकर गावे फाग

मन बसंती तन बसंती, बसंत चारो ओर
रंग उडे गुलाल उडे, फगवा का है शोर

फाल्गुन का महीना, रंगो का है जाल
सजनी साजन के मले, रंग अबीर गुलाल

आस्था और विश्वास पे, लगी समय की घात
पहले जैसी न रही अब, होली की वो बात

फागुन की बयार में, सब कुछ भया अंतरंगी
मृंदंग बन गया है मन, और तन हुआ सारंगी

श्याम वर्ण पर हे! सखी, चढ़ो न दूजो रंग
गोपियों में घिरे श्याम, मुसकाए मंद मंद

देख गोपियो की दशा, उद्धव युक्ति बताए
पहले प्रेम रंग डार दे, फिर हर रंग चढि जाए

धरती पर रंग पसरे सब, हुआ बावरा मन
इक दूजे को जाने बिन, गले लग रहे तन

तेरी मीठी बातों से, तन मन भया गुलाल
बासंती हो जाए धरा, जब तू खोले बाल

उनकी होली कैसे मने, जो सरहद के लाल
दोनो हाथों रख अबीर, नभ में दो उछाल

ये कैसा संयोग है, इस होली के नाम
अवध खेले श्याम संग, द्वारका में श्री राम

राँझां बन के घूम रहे, मिली न उनको हीर
देखे इस होली में इनकी, पलट जाए तकदीर

अब की होली हे! ईश्वर, भर दो इनके थाल
पकवान के ले मजे, हर भूखा इस साल

वो किनारे बैठ कर, करती रही मलाल
बिन साजन होली नहीं, सूखा रह गया गाल

कान्हा बन सब घूम रहे, मुहँ पे रंग लगाए
असमंजस में गोपियाँ, कान्हा उन्हे न बुझाए

हुरियारे नाचत फिरत, पी के ठंडई भंग
जैसे शिव बारात हो, हर कोई मस्त मलंग

प्रकृति हमसे कह रही, खूब खेलो फाग
फागुन मौसम बीतते ही, बरसाऊगीं आग

देश का पैसा खा गए, कर गए बंटाधार 
काश! जेल में बीते इनका, होली का त्यौहार

उनको रंग लगाइऐ,जो टूटे हर बार
हौंसलों के दम पे जो, कर ले मुश्किल पार

फैला दो रंग गगन में, पर मत जाना भूल
पिसना होगा जग में वैसे, जैसे टेसू के फूल

बौराय सब नारी नर, फगुनाय सब संत
भंग घुली हवाओं में,आया ऋतुराज बसंत

अब की होली अवध की, अयोध्या के धाम
सिय के संग रंग खेलत है, वैदेही के राम

धू-धू कर के जल रही,भभक भभक कर आग
वो समझते रहे होलिका,पर बेटी जली थी आज