आपके जानिब.....
आपके जानिब...आप सभी को अपनी रचनाओं के माध्यम से जोड़ने का एक सार्थक प्रयास हैं, जहाँ हर एक रचना में आप अपने आपको जुड़ा हुआ पायेंगे.. गीत ,गज़ल, व्यंग, हास्य आदि से जीवन के उन सभी पहलुओं को छुने की एक कोशिश हैं जो हम-आप कहीं पीछे छोड़ आयें हैं और कारण केवल एक हैं ---व्यस्तता
ताजगी, गहराई, विविधता, भावनाओं की इमानदारी और जिंदगी में नए भावों की तलाश हैं आपके जानिब..
Monday, June 23, 2014
परिवार
Saturday, August 10, 2013
नन्ही कली अश्विका के लिए
आज मेरे घर इक नया मेहमा आया हैं
कब से था इंतेज़ार इस पल का मुझे
वो हसीं इक नई बहार लाया हैं
उसके रोने में भी उसकी छिपी हैं हँसी
उसकी किलकारियों का इक खुमार आया हैं
खुशियाँ अटखेलियाँ करतीं आगंन में अब
वो “नेह्लोक” में इक नई झंकार लाया हैं
दिल में जैसे कोई उतर सा आया हैं
आज मेरे घर इक नया मेहमा आया हैं
दर्द जितना भी था अब भूल गए हम
साथ अपने वो प्यार बेशुमार लाया हैं
बस उस ईश्वर से अब कोई चाह ना रही
“अश्विका” के रूप में नया संसार पाया हैं
दिल में जैसे कोई उतर सा आया हैं
आज मेरे घर इक नया मेहमा आया हैं
Tuesday, April 17, 2012
दोहे-दर्शन (भाग-२)
इस साल की यह पहली प्रस्तुति “दोहे-दर्शन” (भाग-२) खास आपके जानिब..........
किया जतन से बाप ने, थोड़ा सामान सहेज,
फिर भी बलि चढ़ गयी, जब मिला न उन्हें दहेज,
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जिसने जब ये जान लिया, अपने अंदर का भेद,
कि पार नहीं हो सकता कोई, जब हो नाव में छेद,
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दोनों दीन के दुःख हरे हैं, दोनों की शान अज़ीम,
मस्जिद में रहें राम, या फिर मंदिर में रहें रहीम,
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दुःख पड़े तो सब जपे, सुख में करें ना याद,
इसी बात को सोचकर, है अन्दर मूरत उदास,
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मैंने कह दी सब बातें, अपनी तरफ से साफ़
तुम समझो या ना समझो, अल्लाह करे माफ,
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सहती रहती जुल्म अपने पर, उसमे भी तो है जाँ,
है वो भी किसी की बेटी- बहन, या फिर किसी की माँ,
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पाँव नहीं पसारेगा, कैसा भी हो भ्रष्टाचार,
त्याग दे जब लालच को, और रखें शुद्ध विचार,
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जब मेंढक टर्राने लगे, और कौवे करें कांव कांव,
तब बगुले के भेष में, नेता घुसते देखो गाँव गाँव,
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वो बैठा परदेश में, सब कुछ भूले-भाल,
बूढी अंखियाँ तक रही, कब आओगे लाल,
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पाप पुण्य के फेर में, फसें रहें जीवन भर,
छोटी छोटी खुशियों को, कर गए इधर-उधर,
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सूखी धरती-प्यासी आँखें, भूखे पेट-कई सवाल,
दिल्ली तो बहरी भई, अब किससे कहैं वो हाल,
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लड़ने से कुछ हासिल नहीं, क्या तेरा क्या मेरा,
जिस दिन खुले आँख जब, तब समझो भया सवेरा,
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Friday, August 19, 2011
ग़ज़ल
मत समझना की मैंने पी रखी हैं,
बहुत दिनों से ये जुबाँ सी रखी हैं,
तुमने दिया है आज कुछ कहने का मौका,
इसलिए तस्वीर तेरी सीने से लगा रखी हैं,
दिल की बात कहने के अपने हैं कुछ उसूल,
बाकी बातें दिमाग की अब लगती हैं फिजूल,
फसां हुआ था मैं बस इसी कशमकश में,
कि दिल और दिमाग ने ये क्या लगा रखी हैं,
मत समझना की मैंने पी रखी हैं,
बहुत दिनों से ये जुबाँ सी रखी हैं,
किस भूल की आपने हमें ऐसी दी सजा,
अचानक हुए गुम हमें पता भी ना चला,
थक गयी निगाहें तुम्हे जब हर जगह दूंढ के,
एहसास हुआ तब हमें क्या चीज़ गवां रखी हैं,
मत समझना की मैंने पी रखी हैं,
बहुत दिनों से ये जुबाँ सी रखी हैं,
मुद्तों के बाद आज जब देखा हैं तुम्हें,
सुकून सा दिल को ‘अन्जान’ आया है हमें,
वही मासूमियत भरा चेहरा वही मुस्कुराहट है दिखी,
तो लगा खुदा ने मेरी चीज़ आज भी संभाल रखी हैं,
मत समझना की मैंने पी रखी हैं,
बहुत दिनों से ये जुबाँ सी रखी हैं,
Monday, April 4, 2011
लंका दहन
धोनी के धुरंधरों को मेरी तरफ से ये एक सप्रेम भेंट......
गंभीर विशाल विकराल रूप धारण कर,
धोनी ने आते ही मार काट मचाई है,
पहले परेरा कटे फिर कुलसेकरा मरे,
बाद में दिलशान की भी मुंडी उड़ाई है,
लंका को दफनाएँगे, वर्ल्ड कप लायेंगे,
लग रहा कसम इन दोनों ने खायी है,
कहत ‘’अन्जान’’ कवि, मुरली कैसे बच निकला
फिर धोनी ने मुरली की भी, मुरली बजाई है,
ओर-पोर, छोर-छोर मारे ये चहुँ ओर
कौन कह सकता है ये गंभीर धोनी हैं,
एक मारे square कट दूसरा मारे फटाफट,
लगता है जीत अब भारत की ही होनी है,
सोये हुए शेर देखो अचानक आज जाग उठे,
युवी ने भी देखो यार मस्त बाल टांगी है,
कहत ‘’अन्जान’’ कवि मुंबई के वानखेड़े में,
व्याकुल से लंकाई इधर उधर भागी है,
थरंगा को फोड दिया महेला को छोड़ दिया,
संगकारा-दिलशान की भी सीटी बाजाई है,
पहले ज़हीर ने ओर फिर हरभजन ने,
बाद में मुनाफ ने लंका में आग लगाई है,
लंका अब सपने में भी भारत से है डरे,
उनको तो पूरी टीम, हनुमान नज़र आई है,
कहत ‘’अन्जान’’ कवि सचिन के प्रताप से,
पूरी ही टीम ने मिलके, लंका ढहाई है....
Friday, February 4, 2011
इक कड़वा सच ...अम्मा
आज इस मुंडेर पर,
जब कुछ कबूतरों को दाना चुगते देखा
तो अम्मा याद आ गयी,
लगता है कल की ही बात हो,
जब चावल से कंकड चुनते समय वो,
ड़ाल देती थी कुछ दाने कबूतरों के लिए,
और कबूतर भी ऐसे, जैसे बैठे हो केवल,
अम्मा के हाथ से ही दाना चुगने,
याद है मुझे अच्छी तरह से,
ये अम्मा ही तो थी,
जो टूटे हुए एक मटके में पानी भर देती थी
मुंडेर के एक सिरे पर,
उनके पीने के लिए,
और पीते ही पानी कैसे फुर्र से उड़ जाते थे सभी,
इस वादे के साथ की कल फिर आयेंगे,
उन्हें कितना भरोसा था अम्मा पर....
और अम्मा तो बस अम्मा,
देखती रहती टकटकी लगाये उन कबूतरों को
उसी विश्वास के साथ...
ये अम्मा ही थी जब रोटी बनाते वक्त
पहली रोटी गाय के नाम की बनाती थी,
और बड़े सहेज के रखती थी कि,
उसी चितकबरी गाय को खिलाएंगी
जो हर रोज दरवाजे के सामने रंभाती थी
और वो गाय भी जताती थी कि
अम्मा हम आ गए हैं,
उसने भी अम्मा का विश्वास कभी नहीं तोडा..
ये अम्मा ही थी जब सकट चौथ के दिन,
निर्जल व्रत रख अपने लड़कों की उम्र की
दुआएं चाँद से मांगती थी और
चाँद भी देर सवेर निकल ही आता था
केवल अम्मा का व्रत तुड़वाने के लिए,
और क्या मजाल है उस चाँद का
कि उसने भी अम्मा का विश्वास
जो तोड़ा हो कभी,
पर फिर आज क्या हुआ,
वक्त बदल गया है या
परम्परायें बदल गयी है,
ये बूढी अधेड़ उम्र सी दिखने
वाली अम्मा ही तो है
जिसकी नज़र ढूंडती रहती है,
उन कबूतरों को जो कभी
अम्मा के हाथ से दाने चुगने
के लिए उनकी बाट जोहते थे,
उस गाय को जो दरवाजे
पर आके अपने हिस्से कि रोटी
के लिए रम्भा के अम्मा को बुलाती थी,
उस दिन को जब अम्मा चाँद के लिए
भूखी प्यासी शाम तलक रहती थी
सिर्फ अपने लड़कों कि लंबी उम्र के लिए,
बदला कुछ भी नहीं है,
ना वो मुंडेर, ना वो टूटा हुआ मटका,
ना वो गाय और ना ही वो सकट चौथ का दिन,
बस अब उसे कई चीखें सुनाई पड़ती है.....
चावल के दाने डालने कोई ज़रूरत नहीं हैं,
बहुत ही महंगाई है,
और हाँ जी ,
इस टूटे मटके को भी हटाओ,
एक और चीख- अपने खाने को मिलता नहीं
गाय को कौन खिलाये,
फिर एक चीख- कोई फायदा नहीं है ढोंग करने का,
कह दो इनसे,
पर ये अम्मा ही तो है जो
आज भी निर्जल वर्त रखे है
इस आस से कि कम से कम
उसका विश्वास तो ना टूटे,
चाँद आज भी उसका साथ दे रहा है,
कबूतर भी अभी तलक आते हैं,
और बिन दाना चुगे उड़ जाते है,
वो चितकबरी गाय भी आती है
और रम्भा के निकल जाती है,
किसी ने भी अम्मा का साथ नहीं छोड़ा था
तो फिर उसके विश्वास पर सेंध किसने मारी,
शायद उसके अपनो ने ही...
पर ये बात भोली अम्मा नहीं जानती थी
या जान के अन्जान बनी थी........
Sunday, January 2, 2011
ग़ज़ल
कितनी बात छिपी हुई हैं, इस दिल की गहराई में,
तुम आओ तो बात करें हम, मिलकर इस तन्हाई में,
मौसम कितने बीत गए हैं, जिसका कोई हिसाब नहीं,
तुमको कितने खत हैं लिखे, पर इक का भी जवाब नहीं,
अपना हाल कहें अब किससे, याद भरी पुरवाई में,
तुम आओ तो बात करें हम, मिलकर इस तन्हाई में,
दिन काटे अब कटते नहीं हैं, रातें डसती रहती हैं,
इक बैचेनी सी हैं मन में, जिंदगी बोझिल लगती हैं,
तू ही तू याद है मुझको, देखूं तुझे परछाई में,
तुम आओ तो बात करें हम, मिलकर इस तन्हाई में,
बंधन सारे तोड़ के तुम, आ जाओ बस इस पल में,
देखे थे जो ख़्वाब हमने, बदले उसे हकीकत में,
सारे गुनाह अब मेरे सिर पर, क्या रखा है जुदाई में,
तुम आओ तो बात करें हम, मिलकर इस तन्हाई में,