आपके जानिब.....

आपके जानिब...आप सभी को अपनी रचनाओं के माध्यम से जोड़ने का एक सार्थक प्रयास हैं, जहाँ हर एक रचना में आप अपने आपको जुड़ा हुआ पायेंगे.. गीत ,गज़ल, व्यंग, हास्य आदि से जीवन के उन सभी पहलुओं को छुने की एक कोशिश हैं जो हम-आप कहीं पीछे छोड़ आयें हैं और कारण केवल एक हैं ---व्यस्तता

ताजगी, गहराई, विविधता, भावनाओं की इमानदारी और जिंदगी में नए भावों की तलाश हैं आपके जानिब..

Sunday, January 2, 2011

ग़ज़ल

कितनी बात छिपी हुई हैं, इस दिल की गहराई में,

तुम आओ तो बात करें हम, मिलकर इस तन्हाई में,

मौसम कितने बीत गए हैं, जिसका कोई हिसाब नहीं,

तुमको कितने खत हैं लिखे, पर इक का भी जवाब नहीं,

अपना हाल कहें अब किससे, याद भरी पुरवाई में,

तुम आओ तो बात करें हम, मिलकर इस तन्हाई में,

दिन काटे अब कटते नहीं हैं, रातें डसती रहती हैं,

इक बैचेनी सी हैं मन में, जिंदगी बोझिल लगती हैं,

तू ही तू याद है मुझको, देखूं तुझे परछाई में,

तुम आओ तो बात करें हम, मिलकर इस तन्हाई में,

बंधन सारे तोड़ के तुम, आ जाओ बस इस पल में,

देखे थे जो ख़्वाब हमने, बदले उसे हकीकत में,

सारे गुनाह अब मेरे सिर पर, क्या रखा है जुदाई में,

तुम आओ तो बात करें हम, मिलकर इस तन्हाई में,

Saturday, January 1, 2011

दोहे- दर्शन

आज कुछ नया लिखने का मन हुआ तो सोचा कुछ कम शब्दों में अपनी बात कही जाए और फिर मुझे दोहे याद आये.. बातें सब पुरानी ही हैं पर उन्हें नए कलेवर में ढालने का प्रयास किया है..नव वर्ष की बधाई के साथ इस साल की यह पहली प्रस्तुति खास आपके जानिब.......


सीधी सादी बात को, क्यों देते हो तूल,

अहं छोड़ के मान लो, हुयी जो कोई भूल,

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तुझमें है इच्छा शक्ति, फिर क्यों तू कुछ मांग,

छूना है आकाश को, तो पहले मार छलांग,

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सब कुछ अपना वार के, दे देती है जाँ,

जिस स्त्री में है ये गुण, वो कहलाये माँ,

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जितनी सेवा हो सके, उससे ज्यादा कर,

ये रत्न अमूल्य हैं, बुजुर्गों से है घर,

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वो बैठा किनारे पर, लेकर बस इक चाह,

आँखों में दिखती है, दो रोटी की आह,

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मंदिर बने मस्जिद बने, आज भी है ये शोर,

सीख ना ली परिंदों से, जो बैठते दोनों ओर,

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निकल पड़ा सवेरे ही, हो कर थकने चूर,

बच्चे खुश हो जायेंगे, जब लौटेगा मजदूर,

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भूखे को रोटी नहीं, महंगाई की मार,

कब तक सोती रहेगी, दिल्ली की सरकार,

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सब कुछ तो है बिक चुका, सिर्फ बची है जान,

अन्न कहाँ से पैदा करे, ऋण से दबा किसान,

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Monday, December 27, 2010

बेबसी

कलम उठाई कागज तक आया,

लिखना चाहा लिख ना पाया,

इतना बेबस कभी ना पाया,

कलम उठाई कागज तक आया,

चारों तरफ नज़र दौड़ायी,

बेचैनी और मायूसी पायी,

क्योंकि गम ने सबको घेरा,

छोड़ चुके सब रैन बसेरा,

मुझको यारों समझ ना आया,

कलम उठाई कागज तक आया,

लिखना चाहा लिख ना पाया,

कहीं अकाल कहीं हैं पानी,

कहीं जल रही कोई जवानी,

कहीं है झगड़ा कहीं फसाद,

इंसा क्या बन गया है आज,

मन में झाकां कुछ ना पाया,

कलम उठाई कागज तक आया,

लिखना चाहा लिख ना पाया,

सहमे सहमे खड़े हैं लोग,

इक दूजे से डरे हैं लोग,

बात करने से कतराते हैं,

खुद पर ही इतराते हैं,

देख ईर्ष्या की काली छाया,

कलम उठाई कागज तक आया,

लिखना चाहा लिख ना पाया,

यह सब छोड़ उपवन में आया,

दिल ने थोड़ा सुकून पाया,

फूलों की भीनी खुश्बू ने

मंद मंद शीतल हवा ने,

मुझको बस इतना बतलाया,

निराश न हो समय बदलेगा,

प्यार ही प्यार दिलों में रहेगा,

नफरत की कहीं जगह न होगी,

फिर न कोई मुश्किल होगी,

बस तू कलम उठा कागज तक आ,

और लिखता जा बस लिखता जा.....

Sunday, December 26, 2010

ग़ज़ल का एक नया अंदाज़

ग़ालिब ने ठीक ही कहा है ' ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है' कुछ इसी तरह के भाव को मैंने अपनी इस ग़ज़ल में एक नए अंदाज़ से पेश करने की कोशिश की है....

मैं सीरीयस था, वो funny थी

ना जाने किस बात पर वो तनी थी,

टूटा जब दिल तब समझ में आया,

मैं पीतल का छल्ला, वो हीरे की गनी थी,

मैं सीरीयस था, वो funny थी.......

मिले थे बन ने, एक दूजे का हमदम,

पर क्या मालूम था की निकल जायेगा दम,

कुछ दूर चल कर दिखा दिया उन्होंने ठेंगा,

हाय! हाय! वो जालिम, कितनी ही cunning थी,

मैं सीरीयस था, वो funny थी.......

दिल दिल ना हुआ आनाथालय हुआ,

बस जिसको देखा उसी का कायल हुआ,

कमीना था दिल बस निकल पड़ा half hearted,

पर वो मुस्कुराते हुए, पत्थर की तरह खड़ी थी,

मैं सीरीयस था, वो funny थी........

चाहा था अपने सपनों के चावल पकाना,

और उनकी पकी दाल से इसे मिलाना,

पर हुई cooking waste और समझ में आया,

कि उनकी दाल तो कहीं और ही गली थी,

मैं सीरीयस था, वो funny थी........

Wednesday, December 15, 2010

ग़ज़ल

दिल ने मुझसे ये एक बात कह दी

इश्क आसां नहीं हैं आज रात कह दी

दिल ने मुझसे ये एक बात कह दी....

चाहा था जिस शिद्दत से मैंने उनको,

उसी शिद्दत से उन्होंने ना कर दी...

दिल ने मुझसे ये एक बात कह दी....

मैंने देखे थे जो उनको ले के सपने,

सामने उसने मेरे हकीकत रख दी,

दिल ने मुझसे ये एक बात कह दी....

कमबख्त़ ! इश्क के हाथों था मजबूर,

वो हसीं बन के आयीं और चल दी

दिल ने मुझसे ये एक बात कह दी....

Thursday, November 18, 2010

एक नई सुबह की खोज में

रात के पहर में होता हूँ जब तन्हा, तो सोचता हूँ,

कि इस तमस को दूर करने की, सुबह कब आयेगी,

व्याकुल मन अब ग्रसित, इस भय से,

भोर से पहले कहीं ये, नींद न खुल जायेगी,

कि इस तमस को दूर करने की, सुबह कब आयेगी

ये वृक्ष की शाखायें, जो दिवस मुझे अच्छे लगे,

इस पहर में क्यों मुझे, वो इतने भयावह लगे,

और सड़क के इस सिरे पर, जो रहती थी इतनी चहल पहल,

अब इस पहर में वो, क्यों मुझे इतनी वीरान लगे,

रहता हूँ इसी उधेडबुन में, मन की ये उलझन कब जायेगी,

कि इस तमस को दूर करने की, सुबह कब आयेगी,

कोई तो है जो रोकता है, भोर को आने से यार,

कोई तो है जो चाहता है, तमस रहे बरक़रार,

दूर बैठे यही सोचते हैं सुख, समृद्धि और प्रेम राग,

कि लोभ, माया, देव्ष-इर्ष्या, बढ़ा रहे अपना आकार,

ये सोचते ही मन की अग्नि, फिर न कहीं धधक जायेगी,

कि इस तमस को दूर करने की, सुबह कब आयेगी,

टीस है बस मन की यही, कि जानता है मन सभी,

हो न क्यों कितना ही अँधेरा, रौशनी तो आयेगी,

ये ख्याल आते ही बस, मन अब यही सोचता हैं,

कि ठंडी ठंडी निश्चल हवा जब, बदन को सहलायेगी,

पंछियों कि किलकारियाँ जब, हलके से थप-थपायेगी,

सूरज का आगमन और विदाई चाँद की, तारों के साथ हो जायेगी,

स्वपन बीती बात होंगे और हकीकत, सामने हो आयेगी,

तब समझना मेरे दोस्तों! अपनी सुबह हो जायेगी,

Wednesday, November 17, 2010

नन्ही कली

बागीचे में खिली खिली, इक नन्ही मासूम कली,

दूंढ रही हैं अपने अस्तित्व में, लाने वाले उस जनक को

जिसने अपने श्रम से सिंचित, उसे किया इतनी हरी भरी,

दूंढ रही है अब उसे, ये नन्ही मासूम कली.....

पूछा उसने उन बड़े बड़े फूलों से,जो बागीचे में महक रहे थे,

पूछा उसने उन शूलों से,जो अब चुभने के लिए खड़े थे,

पूछा उसने उन भवरों से,जो उस पर मंडरा रहे थे,

पर निरुत्तर से खड़े सभी,इक दूजे को ताक रहे थे,

उनके उतरे चेहरे देख, हो उठी मायूस कली,

दूंढ रही उस जनक को, जिसने किया उसे हरी भरी,

कुम्हलाई मुरझाई सी, झुकी झुकी अलसाई सी,

देखा जब उसने धरा पर, धरती फिर अकुलाई सी,

मन की व्यथा कली की जान,धरती बोली सुन नन्ही जान,

तू मेरे ही गर्भ से निकली, फिर क्यों हो मायूस हैरान,

जिसने तुझको बोया मुझमें, जिसने किया तेरा ये श्रिंगार,

वो तो केवल ईश्वर है, जिसने लिया बस मानवीय अवतार,

खो जायेगी व्यर्थ में यूँ ही, जीवन एक समंदर है,

फिर क्यों पगली दूंढ रही उसे, जो तेरे ही अंदर है,

तू जन्मी है इस धरा पर, बन कर फूल महकने को,

और अपनी मादक महक से, सम्पूर्ण धरा वश करने को,

बात समझ में आते ही, उठ खड़ी हुई निडर-सबल कली,

दिखी नई चमक सी उसमे, खुल के खिली वो नन्ही कली...