हैं और भी दुनिया में शहर
पर तेरी अलग बिसात ए! लखनऊ
दिल दिमाग पर कुछ इस कदर
छा सा गया है शहरे ऐ लखनऊ !
गलियां हो नक्कखास की
या फिर अमीनाबाद की
हर इक तंग गली में जनाब
दिख जाएगा तुझे ऐ लखनऊ !
बजारों की रौनक हो,
या वीरान पड़ी इमारतें
सूरते हाल कुछ भी हो
मुस्कुराता मिलेगा तुझे ऐ लखनऊ !
टुंडे का हो कबाब या
प्रकाश की हो कुल्फी
जुबाँ पे चढ़ जाएगा तेरे
हर जायका ऐ लखनऊ !
रेशमी साडी हो या फिर
चिकनकारी हो कुरतों की
इक बार आजमा ली तो
बस जाएगा तन पे ऐ लखनऊ !
हुसैनाबाद की जुमा मस्जिद हो
या हनुमान सेतु का मन्दिर
सिर कहीं भी झुकाओ अपना
दिख जाएगा तुझमें खुदा ऐ लखनऊ !
हिन्दु भी हैं मुस्लिम भी हैं
धर्म और भी हैं बसते
गंगा-जमुनी तहज़ीब है यहाँ
कौमी एकां की मिसाल ऐ लखनऊ !
मीर का शहर कहो इसे
या बिस्मिल का कहो नगर
कूचे कूचे मे बसा था हुनर
बदस्तूर आज भी छिपा ऐ लखनऊ!
अब क्या जवाब दूँ मैं,
तेरे इस सवाल का
है कौन सा शहर लाजवाब
जुबाँ पर एक ही नाम ऐ लखनऊ!
इस शहर की आबो-हवा के,
हम पर इतने सायें हैं,
मुफ़लिसी में भी यहाँ हमने
खूब जश्न मनाये हैं,
अदब व तहजीब के संग,
दौड़ेगा जब तलक रगो में खूँ
कोई भी तेरी हस्ती मिटा, सकता नहीं ए! लखनऊ